दिल्ली-NCR में अपनी तरह के दुर्लभ मामलों में से एक; 26वें सप्ताह में जन्मे बच्चे ने NEC, सेप्सिस और शॉक जैसी गंभीर जटिलताओं को दी मात; पहले बच्चे के 17 साल बाद परिवार में आई खुशी
03 Oct 2026, Faridabad: दिल्ली-NCR में अपनी तरह के दुर्लभ मामलों में से एक में, गर्भावस्था के महज 26वें सप्ताह में जन्मे और केवल 530 ग्राम वजन वाले एक अत्यंत प्रीमैच्योर बच्चे ने जिंदगी की कठिन जंग जीत ली है। जन्म के बाद करीब तीन महीने तक कई गंभीर और जानलेवा जटिलताओं से जूझने के बाद बच्चा अब स्वस्थ होकर घर पहुंच चुका है। वह मां का दूध पी रहा है और उसका वजन भी लगातार बढ़ रहा है।
हथेली में समा जाने जितना छोटा यह बच्चा जन्म के समय बेहद नाजुक स्थिति में था। गर्भावस्था के दौरान मां को अत्यधिक उच्च रक्तचाप की समस्या हो गई थी, जिसके कारण गर्भ में बच्चे का विकास प्रभावित हुआ। समय से काफी पहले जन्म लेने के कारण उसे जन्म के तुरंत बाद सांस लेने के लिए चिकित्सकीय सहायता की जरूरत पड़ी। बाद में उसे नेक्रोटाइजिंग एंटेरोकोलाइटिस (NEC), सेप्सिस और शॉक जैसी गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ा। NEC विशेष रूप से अत्यधिक समयपूर्व जन्मे शिशुओं में होने वाली आंतों की एक गंभीर बीमारी है, जिसमें आंतों के ऊतकों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
बच्चे की हालत इतनी गंभीर हो गई थी कि डॉक्टरों को करीब तीन सप्ताह तक दूध देना रोकना पड़ा। इस दौरान उसे नसों के जरिए पोषण दिया गया। इन बेहद नाजुक दिनों में बच्चे को वेंटिलेटर सपोर्ट की भी जरूरत पड़ी। आंतों की स्थिति में सुधार आने के बाद बहुत सावधानी के साथ दोबारा दूध देना शुरू किया गया और उसकी सहनशीलता को देखते हुए धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाई गई।
बच्चे का इलाज करने वाले डॉ. हेमंत शर्मा, सीनियर कंसल्टेंट एवं असिस्टेंट प्रोफेसर, नियोनेटोलॉजी, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद ने कहा, “26 सप्ताह में जन्मे और केवल 530 ग्राम वजन वाले इस बच्चे के अंग बेहद अपरिपक्व थे। हमारी पहली प्राथमिकता उसकी स्थिति को स्थिर करना और उसके महत्वपूर्ण अंगों को किसी स्थायी नुकसान से बचाना था।”
इलाज के दौरान बच्चे में गंभीर मेटाबॉलिक असामान्यताएं भी सामने आईं। उसके शरीर में पोटैशियम, कैल्शियम और ब्लड शुगर का स्तर काफी बढ़ गया था, जबकि ब्लड प्रेशर बेहद कम हो गया था और वह शॉक की स्थिति में चला गया था।
इतनी गंभीर जटिलताओं के बावजूद बच्चे को इंट्रावेंट्रिकुलर हेमरेज (IVH) यानी मस्तिष्क में रक्तस्राव नहीं हुआ। उसके ब्रेन अल्ट्रासाउंड और हृदय की जांच के नतीजे भी संतोषजनक रहे। धीरे-धीरे उसकी आंतों की स्थिति में भी सुधार हुआ और वह दोबारा दूध लेने में सक्षम हो गया।
डॉ. शर्मा ने कहा, “सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे ने बहुत अच्छी रिकवरी की है। उसके मस्तिष्क, हृदय या आंतों में कोई बड़ी असामान्यता सामने नहीं आई है। अब वह मां का दूध पी रहा है और उसका वजन भी अच्छी तरह बढ़ रहा है।”
बच्चे की मां सोनिया शर्मा को कंगारू मदर केयर (KMC) का प्रशिक्षण दिया गया। बच्चे की रिकवरी में उनकी सक्रिय भागीदारी भी महत्वपूर्ण रही। जैसे-जैसे बच्चे की स्थिति बेहतर हुई, मां ने त्वचा से त्वचा के संपर्क के जरिए कंगारू मदर केयर देना शुरू किया और बाद में स्तनपान भी शुरू कराया।
इस बच्चे का जन्म परिवार के लिए भावनात्मक रूप से और भी खास था। दंपति की पहली संतान, एक बेटी, का जन्म 17 साल पहले हुआ था।
सोनिया ने कहा, “हमने इस बच्चे के लिए 17 साल इंतजार किया। जब मैंने उसे पहली बार देखा, वह इतना छोटा था कि मुझे उसे छूने में भी डर लग रहा था। इतना सब कुछ झेलने के बाद आज उसे अपने साथ घर ले जाना हमारे परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।”
डॉ. शर्मा ने कहा, “इस बच्चे का सफर बताता है कि अत्यधिक समयपूर्व जन्मे शिशुओं के इलाज में विशेषज्ञ नवजात चिकित्सा, पोषण का बेहद सावधानीपूर्वक प्रबंधन और माता-पिता की सक्रिय भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण होती है।”



