विश्व अस्थमा दिवस पर एकॉर्ड अस्पताल में जागरूकता कार्यक्रम, विशेषज्ञों ने दिए बचाव के टिप्स
फरीदाबाद, 5 मई। विश्व अस्थमा दिवस पर ग्रेटर फरीदाबाद के सेक्टर-86 स्थित एकॉर्ड सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य दमा (अस्थमा) जैसी गंभीर श्वसन बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करना और इसके सही उपचार के बारे में जानकारी देना रहा। इस दौरान अस्पताल के टीबी एंड चेस्ट विभाग के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. सुनील नागर ने मरीजों और उनके परिजनों को जागरूक किया।
डॉ. सुनील नागर ने बताया कि अस्थमा एक ऐसी बीमारी है जिसे पूरी तरह खत्म भले ही न किया जा सके, लेकिन इसे नियंत्रित कर मरीज पूरी तरह सामान्य और सक्रिय जीवन जी सकता है। यदि मरीज नियमित रूप से डॉक्टर की सलाह के अनुसार एंटी-इंफ्लेमेटरी (स्टेरॉयड) इनहेलर का उपयोग करे, तो वह मैराथन दौड़ने से लेकर पर्वतारोहण जैसी गतिविधियां भी कर सकता है। उन्होंने बताया कि इनहेलर सीधे श्वसन नलियों पर असर करता है, जिससे सूजन और सिकुड़न कम होती है और मरीज को जल्दी राहत मिलती है, जबकि दवाओं का असर पूरे शरीर पर होता है और अपेक्षाकृत धीमा होता है।
उन्होंने कहा कि फरीदाबाद जैसे औद्योगिक शहर में दमा के मरीजों की संख्या बढ़ने के पीछे प्रदूषण एक बड़ा कारण है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, फैक्ट्रियों का उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल और कूड़ा जलाने जैसी गतिविधियां दमा को बढ़ावा देती हैं। ऐसे में मरीजों को इन ट्रिगर्स से बचना बेहद जरूरी है। डॉ. नागर ने समाज में फैली इनहेलर को लेकर भ्रांतियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई लोग यह मानते हैं कि इनहेलर की आदत लग जाती है या इसके दुष्प्रभाव होते हैं, जबकि यह पूरी तरह गलत है। इनहेलर सुरक्षित और प्रभावी उपचार है, जिसका असर केवल सांस की नली तक सीमित रहता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कपालभाति और अनुलोम-विलोम जैसे प्राणायाम सहायक हो सकते हैं, लेकिन दमा का इलाज नहीं हैं।
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने अभिभावकों से अपील की कि बच्चों में सांस फूलना, बार-बार खांसी या सीटी जैसी आवाज आने जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें। समय पर पहचान और नियमित उपचार से दमा को नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही मरीजों को धूल-मिट्टी, परफ्यूम, धूप-अगरबत्ती और पालतू जानवरों के संपर्क से बचने की सलाह दी गई। उन्होंने कहा कि इस तरह के जागरूकता कार्यक्रमों का उद्देश्य लोगों को सही जानकारी देना और दमा से जुड़ी गलतफहमियों को दूर करना है, ताकि मरीज बेहतर जीवन जी सकें।
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